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युवा और उनकी समस्याएं | Youth and their problems

Updated: Sep 17, 2021



युवा, नौकरी की तलाश में हैं, लेकिन तय सरकारी नीतियों के कारण योग्य होते हुए भी नौकरी आसानी से नहीं मिल पाती। युवा शिक्षित तो हैं किन्तु उन्हें तकनीकि जानकारी नहीं है। उन्हें कॉलेज से जो शिक्षा मिली है वह केवल किताबी है। उसमें हुनर का अभाव है। अर्थात हमारी शिक्षा नीति भी काफी हद तक सही नहीं है। युवाओं का एक बड़ा वर्ग बेरोजगारी के कारण मूल भूत सुविधाओं से वंचित है। वह अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है।


 

युवाओं की समस्याएं, एक सामाजिक समस्या

आज के समय में युवाओं के जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं हैं। राज्य की आर्थिक अस्थिरता, बेरोजगारी आदि। युवा, नौकरी की तलाश में हैं, लेकिन तय सरकारी नीतियों के कारण योग्य होते हुए भी नौकरी आसानी से नहीं मिल पाती। युवा शिक्षित तो हैं किन्तु उन्हें अ्रन्य कोई तकनीकि जानकारी नहीं है। उन्हें कॉलेज से जो शिक्षा मिली है वह केवल किताबी है। उसमें हुनर का अभाव है। अर्थात हमारी शिक्षा नीति भी काफी हद तक सही नहीं है। शिक्षा युवाओं के उपयोगी सिद्ध नहीं हो पा रही है। भारतीय शिक्षा नीति को लेकर कॉरपोरेट जगत की अक्सर शिकायत रहती है कि उसे जो शिक्षा मिली है उसमें गुणवत्ता का अभाव है। एक सर्वे के अनुसार शिक्षित युवकों में से 80 प्रतिशत छात्र तकनीकि रूप से अयोग्य हैं। कुछ व्यवसाय ही हैं जो वह कर सकते हैं। शिक्षा के आधार पर रोजगार न मिलने पर वह तकनीकि ज्ञान न होने पर, वह स्वयं का कोई रोजगार भी नहीं आरम्भ कर पाते और स्वरोजगार के लिए उपलब्ध अवसरों का लाभ नहीं उठा पाते।

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शिक्षित होते हुए भी युवा बेरोजगार है। परिणाम स्वरूप आपराधिक घटनाओं में युवाओं की बढ़ती संलिप्तता पर अक्सर चिंता जताई जाती है। आजीविका कोई अन्य साधन न होने के कारण, युवा अपनी राह से भटक जाता है। अर्थात गैरकानूनी कमाई की खोज में लग जाता है। देश के असामाजिक तत्व युवाओं की समस्याओं का लाभ उठाते हैं। जो अक्सर अपराध द्वारा निर्भरता की ओर जाता है। युवा, अपने परिवार के भावी जीवन की उम्मीद होता है। एक मध्यम वर्गीय परिवार पूरी उम्र की कमाई बच्चों की उच्च शिक्षा पर खर्च कर देते हैं, जिससे बच्चों का भविष्य उज्जवल हो। युवा वर्ग किसी भी देश की रीढ हैं। यदि वह निराश है, कमजोर है, लाचार है तो देश कमजोर है। युवाओं ऊर्जा का भंडार होते हैं, देश को उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देनी चाहिए, किन्तु ऐसा है नहीं, युवाओं में देश के प्रति रोश है। युवा रोजगार की तलाश में देश छोडकर बाहर जा रहे हैं।


युवा कौन हैं?

युवा अर्थात युवक। जो असीम आशाओं और शक्ति से भरा हो। उसकी आंखों में भावी जीवन के अनेकों स्वप्न हों। जीवन में नियम और मूल्य हों । वह आत्मविश्वास से भरा है। ऐसा कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है, जो बदलाव ला सके। युवा ऊर्जा से भरा होता है। हमारे देश में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि वह आज निराश है, और अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। क्या हैं वह समस्याएं-

आज का युवा बेरोजगार है

घर का बेटा हो या बेटी पढाई पूरी करने के बाद एक अच्छी नौकरी चाहता है। बच्चों केे उज्जवल भविष्य की उम्मीद में मध्यम वर्ग बच्चों की पढाई पर लाखों रूपये खर्च करता है किन्तु भारत सरकार की शिक्षा नीतियां ऐसी हैं कि माता-पिता की जीवन की सारी पूंजी, बच्चों को शिक्षित करने में खर्च हो जाती है। जो निम्न वर्ग है, उसे सरकार की ओर से मुफ्त के नाम पर सभी सुविधाएं मिल जाती हैं, उच्च वर्ग है उसके पास धन की कोई कमी नहीं है। किन्तु मध्यम वर्ग का युवा अनेक परेशानियों से घिरा है। उसके परिवार टेक्स का बोझ है, उसके टेक्स से रेवडियां बांट दी जाती हैं। कुछ कमी रह जाती है उसे आरक्षण पर आधारित नीतियां पूरी कर देती हैं। और युवा को बेरोजगार बना, भीख मांगने के लिए छोड दिया जाता है।


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सडक पर यदि कोई भीख मांगता युवक मिल जाता है तो हम उसके पीछे की सच्चाई जाने बगैर यह कहने से नहीं चूकते कि कि हटटे-कटटे हो नौकरी आदि क्यों नहीं करते? ऐसे हमें कई युवक दिल्ली की सडकों पर रिक्शा चलाते, भीख मांगते या सब्जी बेचते मिला जायेंगे जो अपना घर छोडकर अच्छाई पढाई कर, नौकरी की खोज में आये थे, किन्तु नौकरी तो मिली नहीं, पेट पालने के लिए रिक्शा चला रहे हैं। वह भी अच्छी नौकरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करना चाहते थे, अपने माता-पिता के सपने पूरे करना चाहते थे। अनेक लोगों की उम्मीद उस पर टिकी होती हैं, किन्तु वह क्या करे? पहले शिक्षा के लिए संघर्ष किया, फिर रोजगार के लिए संघर्ष। हमारी सरकारी नीतियां इतनी लचर क्यों हैं? क्या वह नहीं जानते कि युवाओं की योग्यता और अनुभव ही किसी देश को आगे ले जा सकती है? या फिर आरक्षण पर आधारित नीतियां। आरक्षण देश के विकास में बाधक है। शिक्षा के लिए बच्चों को अवसर देना अच्छा है किन्तु रोजगार योग्यता और अनुभव के आधार पर ही मिलना चाहिए। आरक्षण योग्य युवाओं के लिए असहनीय टीस बना हुआ है, यही वजह है कि मेडिकल, इंजीनिरिंग किये हुआ युवा जब चपरासी के पद के लिए आवदेन देता है तो यह पूरी सरकारी नीतियों पर तमाचा है।



बेहद शर्म की बात है। यदि उसे चपरासी का ही काम करना था तो अपने माता-पिता की जीवनभर की कमाई खर्च करने की क्या आवश्यकता थी? किन्तु वह युवा आशाओं से भरा था, उसे विश्वास था कि उसे अच्छा रोजगार उसके योग्यता के आधार पर अवश्य मिलेगा, किन्तु जब हकीकत से सामना होता है, तो उसके युवा चाहे वह लडका हो या लडकी, सपने टूट जाते हैं तो उनमें एक प्रकार रोस भर जाता है। वह विद्रोह पर उतर आते हैं। यही वजह है कि युवाओं में देश के प्रति प्रेम और निष्ठा में काफी कमी आई हैैै।वह देश की नीतियों से निराश और हताश है। वह भी देश के विकास में अपना योगदान देना चहता है। देश को अमेरिका की तरह देखना चाहता है। किन्तु उसे अवसर ही नहीं दिए जाते। युवा देश की शक्ति हैं। किसी देश में युवा की संख्या होने का अर्थ है कि वह देश युवा है। इसके विपरीत यदि युवा भटक रहा है, असंतुष्ट है, बेरोजगार है तो यह देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्थ्या और भविष्य के लिए संकेत सही नहीं है। देश को ऐसी नीतियां अवश्य बनानी चाहिए जिसमें योग्यता के अनुसार, लगभग सभी युवकों के पास रोजगार हो।


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युवाओं में पनपती अपराधिक प्रवृति

जीवन की समस्याएं होने पर मजबूर होना, बचने के लिए संघर्ष, कई युवा लड़के और लड़कियां अपराधिक दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं। परिवारों की सामाजिक असुरक्षा, धन की खोज करने की आवश्यकता युवा लोगों की संस्कृति और शिक्षा को प्रभावित करती हैं। वे अध्ययन से दूर हो जाते हैं आध्यात्मिक आदर्श कम रहने की स्थिति, नुकसान, कार्यान्वयन के अवसरों की कमी, युवा लोगों को शराब और ड्रग्स की कोशिश करने के लिए धक्का देती है। युवा लोगों के बीच शराब की समस्या राक्षसी है, कहने की जरूरत नहीं है। हर दूसरे हाई स्कूल के छात्र सप्ताह में दो बार शराब पीता है। युवा लोगों के बीच नशीली दवाओं की समस्या भी सामयिक है।

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युवाओं के बीच धूम्रपान की समस्या का आकार भी काफी महत्वपूर्ण है। हर तीसरे हाई स्कूल छात्र लगातार धूम्रपान करता है सब के बाद युवा लोगों के बीच धूम्रपान की एक गलत प्रतिष्ठा है, जो कि उनकी राय में, ‘फैशनेबल’ और स्वंतत्रता दिखाती है।


आधुनिक युवाओं में सांस्कृतिक कई शहरों और गांवों में सांस्कृतिक मुक्त समय के लिए कोई शर्त नहीं है। यहां लड़कों और लड़कियों को एक टीवी या कम्प्यूटर के सामने एक सिगरेट और उनके हाथों में एक बोतल के साथियों की कंपनी में बैठते हैं। आध्यात्मिक दरिद्रता में परिलक्षित होता है। आधुनिक युवाओं के भाषण कठोर अभिव्यक्ति, भाषाई मानदंडों का उल्लंघन करते हुए क्रूर शब्दों का उपयोग करती है।

युवाओं की मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी हैं। मुख्य रूप से, एक स्पष्ट जीवन मार्ग दर्शन की कमी के साथ, न केवल माता-पिता, स्कूल और किताबें लड़कों और लड़कियों के जीवन के कानूनों को प्रस्तुत करती है, बल्कि सड़क जन-संस्कृति के उत्पाद, जन-मीडिया स्वयं के अनुभव शक्ति और अनैतिकता में भागेदारी की कमी, युवा अधिकतमवाद युवाओं में उदासीनता या आक्रामकता विकास को उत्तेजित करता है, युवाओं को अनौपचारिक समूहों में शामिल होने के लिए प्रेरित करता है।


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ऐसी परिस्थितियों में माता-पिता क्या करें?

वह बच्चों के तर्क-वितर्क के आगे स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। इन परिस्थितियों में मध्यम वर्ग अधिक प्रभावित है। उनके बच्चों के सपने टूटें हैं, बच्चों में रोष है, ऐसी परिस्थतियों में देश को सोचना चाहिए कि उसकी क्या भूमिका है। वह मध्यम वर्ग से नियमित रूप से टैक्स लेती है, क्या सरकार के पास मध्यम वर्ग के पास कोई नीतियां नहीं है जो युवाओं और उनकी समस्याओं का समाधान कर सके। या माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें और यदि धनोपार्जन के लिए विदेश में बसने के लिए भेज दें तो फिर कहां से आयेंगी बच्चों में देश भक्ति, देश के प्रति निष्ठा? क्या वह देश के विकास में अपना योगदान दे पायेंगे? यह एक बडा सवाल है।




 
 
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