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पूजाघर और वास्‍तु टिप्‍स | Pooja Ghar and vastu tips



लक्ष्मी उन्हीं लोगों के घरों में वास व प्रवेश करती हैं जहां वास्तु दोष न हो। साफ-सफाई का भी पूरा ध्‍यान रखा जाता हाेेे। लक्ष्मी के आगमन के लिए कोई भी व्यक्ति अपनी ओर से कसर बाकी नहीं रखना चाहता। दीपावली का त्योहार सभी धर्मों के लोग मनाते हैं। हिन्दू धर्म के लोगों के घरों में एक ऐसा स्थान अवश्य होता है जहां घर के सभी लोग नतमस्तक होते हैं। वह देव स्थान है - पूजा घर। घर के अंदर पूजाघर, वास्तु के अनुसार ही होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता परिवार सुख-समृद्धि नहीं आती। घर में हमेशा तनाव की स्थिति बनी रहती है।

 

सितम्बर आते ही प्रायः प्रत्येक भारतीय परिवार दीपावली के लिए अपने घर को सजाना-संवारना शुरू कर देता है। प्रकाश का यह मनोरम पर्व लक्ष्मी से संबंधित है। प्रत्येक परिवार चाहता है कि लक्ष्मी उनके घर आये क्योंकि लक्ष्मी धन की देवी हैं। धन-दौलत, सुख-समृद्धि, ऐशो-आराम सभी चाहते हैं। सनातन धर्म में सभी त्यौहार वैज्ञानिक सोच के अनुसार निर्धारित किये गये हैं। जुलाई-अगस्त-सितम्बर महीनों में लगातार बारिश होती है जिससे घरों के अंदर कई तरह के कीड़े-मकोडे़ स्वयं ही पैदा हो जाते हैं। घरों में लगातार बरसात से सीलन आ जाती है। और बीमारियां फैलने का डर बना रहता है, इसलिए बरसात के जाते ही लोग घरों की सफाई का कार्य आरम्भ कर देते हैं।



दूसरा कारण है दीपावली का आगमन। लक्ष्मी उन्हीं लोगों के घरों में वास व प्रवेश करती हैं जहां वास्तु दोष न हो और सफाई का पूूूूरा ध्‍यान रखा जाता हो। लक्ष्मी के आगमन के लिए कोई भी व्यक्ति अपनी ओर से कसर बाकी नहीं रखना चाहता। दीपावली का त्योहार सभी धर्मों के लोग मनाते हैं। हिन्दू धर्म के लोगों के घरों में एक ऐसा स्थान अवश्य होता है जहां घर के सभी लोग नतमस्तक होते हैं। वह देव स्थान है पूजा घर। घर के अंदर पूजाघर, वास्तु के अनुसार ही होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता परिवार सुख-समृद्धि नहीं आती। घर में हमेशा तनाव की स्थिति बनी रहती है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से वास्तुशास्त्र की आवश्यकता

शिशु मां के गर्भ में नौ माह अपार सुख का आनन्द लेता है। जन्म से पहले यह सुख उसके अवचेतन मस्तिष्क पर चिन्हित हो जाता है। जन्म के पश्चात व्यक्ति तापमान नियंत्रण, वातानुकूलन, शांत वातावरण, पौष्टिक, स्वादिष्ट व ताजे भोजन आदि के द्वारा उस परम सुख को पुन: प्राप्त करने का प्रयास करता है। यह सब सही वायु संचार द्वारा प्राकृतिक रूप में प्राप्त किया जाता है।



मकान का मध्य भाग, जिसे ब्रह्मस्थान भी कहा जाता है, शिशु की कमल नाल की भांति काम करता है। यह मकान को आवश्यक भोजन जैसे गर्मी, रोशनी और हवा प्रदान करता है। साथ ही उसे अनंत अंतरिक्ष से जोडकर उसमें आकाश तत्व को भर देता है।

वास्तु का परिधीय भाग, जो पैशाच स्थान होता है, मनुष्य की त्वचा की तरह कार्य करता है। त्वचा शरीर के तापमान को नियंत्रित रखती है।


वास्‍तु पुरूष और दिशाएं


घर में विभिन्न दिशाओं पूजा घर और उसके वास्तु अनुसार प्रभाव

सर्वप्रथम तो यह प्रयास होना चाहिए कि भवन निर्माण के समय ही इस बात का ध्यान रखा जाए कि घर में मंदिर वास्तु अनुसार ही बनाया जाये किन्तु किसी कारणवश ऐसा नहीं हो पाता तो प्रयास होना चाहिए कि वास्तु दोष दूर करने के लिए घर के अंदर बिना तोड़-फोड़ या कम से कम तोड़-फोड़ हो। वैसे तो ईश्वर कण-कण में हैं। लेकिन अपने घर में देव स्थान बनाना बहुत ही शुभ कार्य है। पिछले कुछ वर्षों में लोगों को वास्तु की महत्ता से अवगत हुए हैं। वास्‍तु कोई अंधविश्‍वास नहीं बल्कि विज्ञान है। वास्तुशास्त्र के नियम, वैज्ञानिकता पर आधारित हैं।


ईशान कोण

  • वास्तु अनुसार घर में पूजा स्थल, ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा में होना चाहिए। ईशान कोण पूजा घर के लिए सर्वोतम कोण है। इस कोण के स्वामी गुरू ब्रहस्पति हैं।

  • ईशान कोण में पूजा स्थान होने से परिवार में सकारात्मक वातावरण बनता है।

  • परिवार में सभी का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

  • आयु लंबी होती है।

  • यदि हम घर के पूर्व दिशा में मंदिर का निर्माण करते हैं तो घर का मुखिया बुरी संगत से दूर रहता है। मन में सात्विक विचार आते हैं।

  • समाज में मान-सम्मान बढता है।



आग्नेय कोण

  • यदि हम आग्नेय कोण में मंदिर बनाते हैं तो घर में बड़ा वास्तु दोष माना जाता है। इससे परिवार के मुखिया में रक्त संक्रमण का खतरा बढ जाता है। वह हमेशा गुस्से में रहता है।

नैऋर्त्य कोण

  • नैऋर्त्य कोण में मंदिर बनाने से घर के मुखिया में पेट संबंधी विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

वायव्य कोण

  • वायव्य कोण में मंदिर निर्माण करते हैं तो घर का मुखिया यात्राओं का शौकीन होता है।

  • उसका मन हमेशा अशांत रहता है और वह पत्नी को छोड़ कर दूसरी औरत की संगत में आकर राह से भटक सकता है जिससे दाम्पत्य जीवन में कलह का वातावरण पैदा होने लगता है।

ब्रह्म स्थान

ब्रह्म स्थान मंदिर बनाना सबसे उत्तम माना गया है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है। ब्रह्म स्थान, घर का मध्य भाग कहलाता है। यह बहुत ही शुभ स्थान है। घर में यह स्थान ऊपर से खुला होना चाहिए। जिससे घर में उपयुक्त सूर्य की रोशनी आ सके। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह स्थान खुला होना चाहिए घर में उपयुक्त सूर्य की रोशनी आने से घर में कीड़े मकोडों का वास नहीं हो पाता।



घर में मंदिर के लिए कुछ नियमः

  • सर्वप्रथम मंदिर ईशान कोण या ब्रह्मस्थान में होना चाहिए।

  • घर में मंदिर में प्रकाश की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

  • मंदिर की दीवारें टूटी-फूटी नहीं होनी चाहिए।

  • मंदिर में कोई भी टूटी या खंडित भगवान की मूर्ति या टूटा सामान नहीं होना चाहिए।

  • जिस घर में मंदिर की साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता, अंधेरा रहता है। उस घर के सदस्यों के शत्रु अधिक होते हैं। समाज में मान सम्मान नहीं रहता। और लगातार आर्थिक तंगी बनी रहती है।

  • घर में मंदिर बनाते समय इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि मंदिर का निर्माण घर की सीढियों के नीचे न करें।

  • मंदिर के ऊपर शौचालय का निर्माण न करें।

  • यदि मंदिर के नीचे से गंदा पानी जाता है तो यह भी अशुभ होता है।

  • मंदिर की छत के ऊपर से भी गंदे पानी की नाली नहीं जानी चाहिए। यह अशुभ है।

  • मंदिर के सामने या पीछे बाथरूम होना बेहद अशुभ है ऐसा होने पर उस घर के व्यक्ति भौतिक सुखों से वंचित रहते हैं। उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।



घर में मंदिर के लिए आवश्यक बातें:

  • यदि आप घर के किसी कमरे जैसे ड्राइंग रूम या बेड रूम में मंदिर बनाते हैं तो उसकी ऊंचाई घर में बैठने के स्थान से ऊंची होनी चाहिए। उदाहरण के लिए सोफा या बेड से ऊंची होनी चाहिए।

  • जिन घरों में मंदिर बेडरूम में बनाया जाता है उस घर की महिलाएं हमेशा वाद-विवाद से घिरी रहती हैं। स्थान की कमी के कारण यदि बेडरूम या ड्राइंग रूप में मंदिर बनाते हैं तो उसके पूजा के बाद पर्दा डाल कर रखें।

  • मंदिर की दीवारों का रंग पीला या लाल करें।

  • मंदिर में चौकी पर बिछाने के लिए पीले कपडे का प्रयोग शुभ है।

  • घर में साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें।

  • घर के मंदिर में मूर्तियों का आकार अधिक बड़ा नहीं होना चाहिए।

  • घर के मंदिर में दो शंख और तीन गणेश की मूतियां नहीं होनी चाहिए।?

  • मंदिर में कम से कम मूर्तियों की स्थापना करें।

  • घर के मंदिर में नियमित रूप से भगवान को भोग लगायें।

  • नियमित रूप से सुबह और शाम दीपक प्रज्जवलित करें।

  • दीपक सरसों का तेल, तिल का तेल अथवा देशी का घी किसी का भी आप अपनी सामर्थ्य के अनुसार जलायें।

  • पुरूष हो या स्त्री, मंदिर में अशुद्ध अवस्था में न जायें।

  • स्नान के बाद ही मंदिर को स्पर्श करें।



 
 
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