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निंदक नियरे राखिए,.....निर्मल करे सुभाय। | Nindak niyare raakhie,....., nirmal kare subhaay.

Updated: Apr 17



निंदा एक प्रकार की हिंसा ही है, जिसकी चोट दिखाई तो नहीं देती, किन्तु होती बडी गहरी है। जब भी कोई व्यक्ति, किसी की निंदा करता है तो वह निंदा कर रहे व्यक्ति के चारित्रिक स्तर को दर्शाती है। निंदा करना, व्यक्ति को एक कदम स्वयं के विनाश की ओर ले जाता है। निंदा करने करने और सुनने वाले दोनों ही दोषी माने गये हैं। क्योंकि जब व्यक्ति पूरा रस लेकर सुनता है तभी निंदा करने वाले को आनन्द आता है और वह भी पूरे आनन्द के साथ निंदा कर पाता है।

 

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

- कबीर

अर्थात: जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिक से अधिक पास ही रखना चाहिए क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव को साफ कर देता है।



यह कबीर जी का दोहा है जो उनकी साखियों से लिया गया है। उन्होंने समाज की ऐसी कई बुराइयों पर अपने दोहों के द्वारा सीधी चोट की है किन्तु प्रश्न यह है कि क्या कभी भी किसी की निंदा करनी चाहिए?

नहीं।

निंदा एक प्रकार की हिंसा ही है, जिसकी चोट दिखाई तो नहीं देती, किन्तु होती बडी गहरी है। जब भी कोई व्यक्ति, किसी की निंदा करता है तो वह निंदा कर रहे व्यक्ति के चारित्रिक स्तर को दर्शाती है। निंदा करना, व्यक्ति को एक कदम स्वयं के विनाश की ओर ले जाता है। निंदा करने करने और सुनने वाले दोनों ही दोषी माने गये हैं। क्योंकि जब व्यक्ति पूरा रस लेकर सुनता है तभी निंदा करने वाले को आनन्द आता है और वह भी पूरे आनन्द के साथ निंदा कर पाता है।

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यह एक ऐसा स्वभाव है जिसमें तुम हमेशा विध्वंस की तलाश में रहते हो। जब तक तुम्हें कहीं कुछ तोड़ने-फोड़ने को मिल जाए, तो तुम्हारे आनंद का अंत नहीं होता। बनाने में किसी की कोई रूचि नहीं है। किसी की तकलीफ, किसी के आंसू निंदा करने वाले और सुनने वाले को आनन्द देते हैं, खुशी देते हैं। यह मिटाने की प्रवृति है जिसके लिए लोगों में बड़ी उत्सुकता रहती है। अगर समय मिले तो इस उत्सुकता को अपने भीतर खोजना। निंदा करना एक प्रकार का भाव है।



कैसी विडम्बना है। यदि कोई सत्य या अच्छी बात कही जाती है तो व्यक्ति उसका प्रमाण मांगता है, बिना प्रमाण वह व्यक्ति के द्वारा किये गये अच्छे कार्यों पर विश्वास नहीं कर पाता, किन्तु किसी की निंदा कर दी जाये तो व्यक्ति बिना किसी प्रमाण के बात स्वीकार कर लेता है। अगर मैं किसी की निंदा करूं, तो आप बिना किसी विवाद के स्वीकार कर लेते हैं। अगर मैं किसी की प्रशंसा करूं, तो आपका मन एकदम चौंक जाता है, आप स्वीकार करने को राजी नहीं होते हैं। आप कहते हैं, अरे नहीं, आपने गलत सुना होगा। ऐसा नहीं हो सकता। सबूत क्या है? प्रमाण क्या है? आप वहम में पड़ जाते हैं! लेकिन जब कोई निंदा करता है, तब आप ऐसा नहीं कहते।

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कभी आपने देखा या महसूस किया कि जब आपसे कोई किसी की निंदा करता है, तो आपका मन कैसे स्वीकार कर लेता है। हम एक पल भी नहीं सोचते और न ही निंदा करने वाले से उस बात का प्रमाण ही मांगते हैं। यदि निंदा सुनने वाले इस बुराई को अन्य लोगों तक पहुंचाता है।



यह कैसा स्वभाव है?

कैसे भाव से स्वीकार करते हैं? आप यह नहीं पूछते कि यह बात सच है? आप यह नहीं पूछते कि इसका प्रमाण क्या है? आप यह भी नहीं पूछते कि जो आदमी इसकी खबर दे रहा है, वह प्रमाण योग्य है? आप यह भी नहीं पूछते कि इसको मानने का क्या कारण है? क्या प्रयोजन है?

नहीं, कोई निंदा करता है तो सुनने वाले का व्यक्ति का चेहरा एकदम खिल जाता है। निंदा को आत्मसात करने के लिए हमारा दिल स्वीकार कर लेता है। इतना ही नहीं, जब आप यही निंदा दूसरे को सुनाते हैं, क्योंकि ज्यादा देर आप रुक नहीं सकते।

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निंदा सुनने और करने का अलग ही रस है किन्तु निंदा करने वाला या सुनने वाला एक पल भी नहीं सोचता कि यदि इस बात में एक प्रतिशत भी सच्चाई नहीं हुई तो उस व्यक्ति को कितना कष्ट होगा? उसके हमारे बारे में विचार होंगे। जब हम ईश्वर से प्रार्थना करते है तो इस विश्वास के साथ करते हैं कि ईश्वर हमारी प्रार्थना सुन रहा है हमें हल पल देख रहा है। व्यक्ति की निंदा करते और सुनते समय यह क्यों भूल जाते हैं?

निंदा एक प्रकार की हिंसा है किन्तु यह हिंसा दिखाई नहीं देती। किसी को छुरा मानो या किसी मारो तो यह हिंसा दिखाई देती है किन्तु यह हिंसा दिखाई नहीं देती किन्तु कष्ट, दिखाई देने वाली हिंसा से अधिक देती है।

ऐसा लोग इसलिए कर पाते हैं क्योंकि शायद निंदा करने वालेा को कोई पकड़ने वाला नहीं है। इसलिए कोई झंझट नहीं है। हिंसा भी हो जाती है साध्य, रस भी आ जाता है। पर निंदा करते समय इतना अवश्य याद रखना कि जितनी निंदा पहले आदमी ने की थी, उससे दुगुनी करके तुम दूसरे को सुना रहे हो। अगर उसने पचास कहा था, तो तुमने सौ संख्या कर ली है। निंदा का रस इतना गहरा है कि आदमी उसे बढ़ाए चला जाता है।



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लेकिन कोई तुमसे प्रशंसा करे किसी की, तुमसे नहीं सहा जाता फिर, तुम्हारे दिल की धडकने रूक जाती हैं। दिल के द्वार-दरवाजे सख्ती से बंद हो जाते हैं। और तुम जानते हो कि यह बात गलत है, यह प्रशंसा हो नहीं सकती, यह आदमी इस योग्य हो नहीं सकता। तुम तर्क करोगे, तुम दलील करोगे, तुम सब तरह के उपाय करोगे, इसके पहले कि तुम मानो कि यह सच है। और तुम जरूर कुछ न कुछ खोज लोगे, जिससे यह सिद्ध हो जाए कि यह सच नहीं है। और तुम आश्वस्त हो जाओगे कि नहीं, यह बात सच नहीं थी। और यह कहने तुम किसी से भी न जाओगे, कि यह प्रशंसा की बात तुम किसी से कहो। यह तुम्हारा जीवन के प्रति असम्मान है और मृत्यु के प्रति तुम्हारा सम्मान है।

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बुरा सुनने की प्रवृति इतनी गहरी है कि यदि अखबार में कुछ हिंसा की घटनाओं की चर्चा न हुई हो, कहीं कोई आगजनी न हुई हो, कहीं कोई लूटपाट न हुई हो, कोई डाका न पड़ा हो, कोई युद्ध न हुआ हो, कहीं बम न गिरे हों, तो तुम अखबार ऐसा पटक कर कहते हो कि आज तो कोई खबर ही नहीं है! क्या तुम इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे? क्या तुम सुबह-सुबह उठ कर यही अपेक्षा करते हो कि तुम्हें प्रतिदिन बलात्कार, लूट, आगजनी की खबरें पढने को मिलें जिससे तुम्हारे अखबार के पैसे वसूल हो जायें। तुम यह सोचकर खुश क्यों नहीं हो पाते कि समाज में हिंसा कम हो रही है। तुम सोचते हो कि कोई समाचार ही नहीं है। तुम्हें लगता है कि अखबार में जो दो रुपये खर्च किए थे, वे व्यर्थ गए। तुम्हारे दो रुपये के पीछे तुम क्या चाह रहे थे, इसका तुमने कुछ सोच-विचार किया? तुम्हारे दो रुपये की सार्थकता का कितना मूल्य तुम लेना चाहते हो इस दुनिया से?



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यह सच है कि अखबार भी तुम्हारे लिए ही छपते हैं। वह मनुष्य की प्रवृति जानते हैं इसलिए अखबार वाले भी अच्छी खबरें नहीं छापते। उसे कोई पढ़ने वाला नहीं है, उसमें कोई सेन्सेशन नहीं है, उसमें कोई उत्तेजना नहीं है। अखबार वाले भी वही छापते हैं, जो तुम चाहते हो। वहीं खोजते हैं, जो तुम चाहते हो। दुनिया में जो भी कचरा और गंदा और व्यर्थ कुछ हो, उस सबको इकट्ठा कर तुम्हारे लिए लाते हैं। ऐसी गंदी और हिंसा की खबरें पढकर तुम खुश हो जाते हो, तुम्हारे दो रूपये खर्च करना सार्थक हो जाता है। फिर ऑफिस आदि में दिन भर इसकी चर्चा करते हो, क्राइम कितना बढ रहा है। उसका प्रचार करते हो। यह मान लो कि तुम्हारा ज्ञान अखबार से ज्यादा नहीं है, फिर तुम उसी को दोहराते हो।

चयन आपको करना है कि आपको किस में आनन्द आता है। आप नकारात्मकता को खोजते हैं आनन्द लेते हैं या फिर कुछ सकारात्मक करते हैं।



तुम स्वयं को आंको, निरीक्षण करो। इससे तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारा जीवन को देखने का दृष्टिकोेेण क्या है? तुम चाहते क्या हो? तुम्हारी मनोदशा क्या है? इसको तुम पहचानना और तब इसे बदलना। तब देखना जहां-जहां तुम्हें लगे कि मृत्यु, हिंसा और विध्वंस के प्रति तुम्हारा रस है, उसे हटाना। और जीवन के प्रति बढ़ाना। अच्छा हो कि जब कली फूल बन रही हो, तब तुम रुक जाना। घड़ी भर वहां बैठ कर ध्यान कर लेना उस फूल बनती कली पर, क्योंकि वहां जीवन खिल रहा है। अच्छा हो कि कोई बच्चा जहां खेल रहा हो, हंस रहा हो, नाच रहा हो, वहां घड़ी भर तुम कुछ देर वहीं रुक जाओ, उसके साथ खेलो, आनन्द लो।

इसके विपरीत यदि दो आदमियों में झगडा हो रहा हो तो वहां तुम्हारे रूकने की कोई वजह नहीं है। क्योंकि यदि तुम उन पर ध्यान देते हो तो उन्हें और आनन्द आएगा। अगर भीड़ इकट्ठी न हो तो लड़ने वालों का रस भी चला जाता है। अगर कोई देखने न आए, तो लड़ने वाले भी सोचते हैं कि बेकार है। जब भीड़ इकटठी हो जाती है तो लड़ने वालों को भी रस आ जाता है। जितनी भीड़ बढ़ती जाती है, उतना उनका जोश गरम हो जाता है, उतना अहंकार और प्रतिष्ठा का सवाल हो जाता है।

इसलिए तुम यह मत सोचना कि तुम खड़े थे तो तुम भागीदार नहीं हो तुम भी उस लडाई के भागीदार बन जाओगे, इसलिए आगे बढो। इस प्रकार ही तुम्हारी भागीदारी से निंदा करने वाले को प्रोत्साहन मिल जाता।



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तुम अपनी रूचि को खोजो। तुम्हारी किसमें रूचि है। अपनी रूचि को जीवन की तरफ ले जाओ और तुमसे जीवन के लिए जो कुछ बन सके, तुम करना।

अगर ऐसा तुम्हारा भाव हो तो तुम अचानक पाओगे, तुम्हारी हजार चिंताएं खो गईं, क्योंकि वे तुम्हारी रुग्ण-वृत्ति से पैदा होती हैं। तुम्हारे हजार रोग खो गए, क्योंकि तुम्हारे रोग, तुम विध्वंस की भावना से भरते थे। तुम्हारे बहुत से घाव मिट गए, क्योंकि उन घावों को तुम दूसरे को दुख पहुंचा-पहुंचा कर खुद भी स्वयं को दुख पहुंचाते थे और उन्हें कुरेद-कुरेद कर हरा करते थे।


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इस जगत में केवल वही आदमी आनंद पा सकता है जो अपनी तरफ से, जहां भी आनंद घटित होता हो, उस आनंद से आनंदित होता है। इसलिए सकारात्कता की ओर अपना कदम बढाओ और निंदा में रस लेना छोडो। अहिंसावादी बनो, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से। निंदा करने से सुनने और करने वाले दोनों के मन ही दूषित हो जाते हैं। और दूषित वस्तु किसी भी रूप में उपयोगी और पूजनीय या वंदनीय नहीं हो सकती।





 
 
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