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नई परिभाषा | New definition

Updated: Mar 27



सास-बहू संबंधों के हर पहलू की जांच, हर किसी के लिए अपने स्तर पर निहायत व्यक्तिगत कार्य हैं। लेकिन यह सच है कि यह संबंध अन्य रिश्तों की भांति प्राकृतिक, स्नेहपूर्ण, आत्मीय या रागात्मक नहीं लगता। यह रिश्ता हमें जन्म के साथ नहीं मिलता। इसलिए सास-बहू के मधुर संबंधों के लिए दोनों पक्षों के समझौतावादी व रचनात्मक प्रयास आवश्यक हैं। सास यदि बहू को घर की आर्थिक जिम्मेदारी देने में झिझकती हैं। यह आवश्यक नहीं कि आप बहू को पूरी जिम्मेदारी दें। इसका दूसरा समाधान भी निकाला जा सकता है। क्योंकि किसी भी कार्य की जिम्मेदारी देने से पहले बहू अपने कार्यों में दक्ष करना भी आवश्यक है। बहू से सलाह लें। बहू को यह अहसास कराएं कि वह भी इसी घर का हिस्सा है। वास्तव में यही सच्चाई ही है।


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बहू आपकी उत्तराधिकारी है, बेटा नहीं। जब बेटा अपने पिता की जिम्मेदारी संभालता है तो बहू आपकी। लेकिन वह अभी इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने यदि परिपक्व नहीं है तो बहू को बेटी बनाइये उसे जिम्मेदारी उठाने में मदद करिये। गलती हो जाए तो प्यार से समझाएं। और बहू को चाहिए कि वह सास में मां की ममता को देखे। गलती पर मां भी डांटती हैं, समझाती हैं। तरीकों में थोड़ा अंतर हो सकता है किन्तु इरादे अधिकतर नेक ही होते हैं। परिवार की शांति को मजबूत करने के लिए इन संबंधों में माधुर्य हर हालत में आवश्यक है।



सास-बहू के रिश्तों में कलह के कारणों की जांच करें तो पता चलता है कि अधिकतर कलह के कारण आर्थिक न होकर मानसिक ही होते हैं। सास-बहू कलह, हमारे समाज में एक शाश्वत परंपरा की तरह विद्यमान है। इस रिश्ते का इतिहास उठाकर देखें तो अधिकतर कटुता से भरा ही मिलेगा। सामान्य भारतीय परिवारों में बचपन से ही लड़की के मन में सास रूपी हौवा खड़ा कर दिया जाता है। इस तरह धीरे-धीरे मन से कोमल बच्ची के बन में सास रूपी हौवे का डर बैठा दिया जाता है। सास का खतरनाक रूप प्रस्तुत किया जाता है। विवाह के बाद लड़की की सास चाहे जितनी सरल और सौम्य अथवा ममतामयी हो, किन्तु लड़की के लिए बरसों पुराने पूर्वाग्रहों से मुक्त होना भी आसान नहीं है। लड़की को सास की सरलता और सहजता में भी षडयंत्र नजर आता है। ऐसी सूरत में संबंधों में कटुता और तनाव रहना आश्चर्य की बात नहीं है। इसलिए जरूरी है कि कभी भी माता-पिता बच्चों के अपरिपक्व मस्तिष्क में इस प्रकार की गलत धारणाएं न भरें।

जिस तरह बहू ससुराल को लेकर अपने नये जीवन के सपने बुनती है उसी तरह सास के मन में भी बहू को लेकर कई तरह की अपेक्षाएं और सपने होते हैं। बेटे के जन्म के बाद से ही एक मां बहू को लेकर सपने संजोने लगती है। जिनमें कहीे भी बहू को लेकर नकारात्मक विचार नहीं होते। किन्तु जैसे ही बहू का गृह प्रवेश की रस्म होती है उसके बाद धीरे-धीरे सास स्वयं के भविष्य को को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगती है। उन्हें बेटे से अपने अधिकार कम करने पड़ते हैं जिन्हें लेकर शायद वह मानसिक रूप से तैयार नहीं होतीं।

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बहू जब घर आती है तो बहू के भी कुछ अधिकार होते हैं, लेकिन सास अपनी बरसों की मेहनत, त्याग और कठिनाइयों के आधार पर खड़ी की गई घर-गृहस्थी पर आसानी से वर्जस्व नहीं छोड़ना चाहतीं। दोनों के बीच एक पीढ़ी का अंतर होता है। सास-बहू के आपसी तनाव से पूरे परिवार की शांति भंग होती है। इस तनाव से पिता पुत्र तथा बच्चे भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाते। प्रतिदिन की कलह संयुक्त परिवार को इस कदर खोखला कर देती है कि एक दिन परिवार का ढांचा चरमरा कर गिर पड़ता है।



सास-बहू संबंधोें को प्रभावित करने वाले कारणों में आर्थिक कारण भी बहुत बढ़े हैं। दहेज को लेकर बहू को प्रताडि़त करना आम बात हो गई है। इसके अलावा, घर के आर्थिक अधिकारों में कटौती, बहू को खर्च का कार्य सौंपना आदि बातें शायद ही कोई सास मंजूर कर सकती है। अविश्वास की इस यह भावना, भावनात्मक संबंधों को महज औपचारिक बने रहने के लिए विवस करती है।


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सास-बहू संबंधों के हर पहलू की जांच, हर किसी के लिए अपने स्तर पर निहायत व्यक्तिगत कार्य हैं। लेकिन यह सच है कि यह संबंध अन्य रिश्तों की भांति प्राकृतिक, स्नेहपूर्ण, आत्मीय या रागात्मक नहीं लगता। यह रिश्ता हमें जन्म के साथ नहीं मिलता। इसलिए सास-बहू के मधुर संबंधों के लिए दोनों पक्षों के समझौतावादी व रचनात्मक प्रयास आवश्यक हैं। सास यदि बहू को घर की आर्थिक जिम्मेदारी देने में झिझकती हैं। यह आवश्यक नहीं कि आप बहू को पूरी जिम्मेदारी दें। इसका दूसरा समाधान भी निकाला जा सकता है। क्योंकि किसी भी कार्य की जिम्मेदारी देने से पहले बहू अपने कार्यों में दक्ष करना भी आवश्यक है। बहू से सलाह लें। बहू को यह अहसास कराएं कि वह भी इसी घर का हिस्सा है। वास्तव में यही सच्चाई ही है। बहू आपकी उत्तराधिकारी है, बेटा नहीं। जब बेटा अपने पिता की जिम्मेदारी संभालता है तो बहू आपकी। लेकिन वह अभी इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने यदि परिपक्व नहीं है तो बहू को बेटी बनाइये उसे जिम्मेदारी उठाने में मदद करिये। गलती हो जाए तो प्यार से समझाएं। और बहू को चाहिए कि वह सास में मां की ममता को देखे। गलती पर मां भी डांटती हैं, समझाती हैं। तरीकों में थोड़ा अंतर हो सकता है किन्तु इरादे अधिकतर नेक ही होते हैं। परिवार की शांति को मजबूत करने के लिए इन संबंधों में माधुर्य हर हालत में आवश्यक है।



 
 
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