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बच्चाेें में बढती नकारात्मक प्रवृति | Increasing negative trend in children

Updated: Sep 25, 2021



आज की भाग-दौड भरी जिंदगी में बच्चों में अकेलापन बढ रहा है। यह समस्‍या विश्‍व स्‍तरीय है। बढती मंहगाई और जिम्मेदारियों के कारण माता-पिता दोनों का कार्य करना आवश्यक हो गया है। इन सबके कारण बच्चों का बचपन कहीं मुरझाता जा रहा है। उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। शिक्षा व्यवस्था बदली है। समयाभाव के कारण माता-पिता बच्चों को पढा नहीं पाते उन्हें मंहगे स्कूलों, कोचिंग या टयूशन आदि डाल दिया जाता है और बच्चों की क्षमता को समझे बगैर उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनने के लिए तैयार किया जाता हैै। बच्चा क्या चाहता? उनकी रूचि, उनके सपने, उनकी इच्छा के बारे में उनसे पूछा तक नहीं जाता, बस उन्हें सूचित किया जाता है। इन सबके कारण बचपन को जाने-अनजाने कुचला जा रहा है।

 

बच्चों में नकारात्मक विचार क्यों आते है ?

आज माता-पिता के पास समय नहीं है। वह जिंदगी की भागदौड में इतना व्यस्त हैं कि वह बच्चों पर कम ही ध्यान दे पाते हैं। यह समस्‍या विश्‍व स्‍तरीय है। इंडिया, अमेरिका, कनाडा, न्‍यूजीलैंड, रूस, जापान विश्‍व का कोई भी देश हो, यह समस्‍या हर बच्‍चा फेस कर रहा है। आज अधिकतर एकांकी परिवाराेें का चलन है। जब बच्चा स्कूल से थक कर घर आता है तो वह घर में किसी को नहीं पाता। वह अकेला, एकदम अकेला हो जाता है। उसका भी मन करता है कि उससे कोई पूछे कि आज स्कूल में क्या हुआ, आज स्कूल में लंच क्यों नहीं खाया आदि। कोई उसकी फिक्र करे। माता-पिता देर रात तक घर आते हैं। उनके पास बच्चों से बात करने तक का समय नहीं होता। वह बच्चों को महंगे गेजट्स दिला कर अपना फर्ज अदा कर देते हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने बच्चों के लिए बहुत बडा कार्य कर दिया। उन्होंने बच्चों को दुनिया की सारी खुशियां दे दीं। जबकि बच्चों को माता-पिता अपनत्व और प्यार व दुलार की आवश्यकता होती है।


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बच्चों का मन बहुत ही कोमल होता है। यदि बच्चों को माता-पिता का भरपूर प्यार या अपनत्व मिले तो वह किसी भी वस्तु को खिलौना बनाकर खेल लेगा और खुश भी रहेगा। आपने कभी भी नहीं सुना या देखा होगा कि फलां बच्चे को खिलौने कम या कीमती खिलौने नहीं मिले इसलिए बच्चा डिप्रेशन में चला गया या नकारात्मकता की ओर चला गया। बच्चों को ये सब नहींं चाहिए। वह तो आपसे अपनापन या प्यार के दो बोल चाहता है। बच्चा चाहता है कि मां उसके लिए खाना बनाये, घर पर उसका इंतजार करे, पिता उसके साथ खेले। जब बच्चे को यह सब नहीं मिल पाता तो उसका स्वभाव चिडचिडा हो जाता है। इसके अकेलेपन के कारण उसमें नकारात्मक विचार आने लगते हैं। उसके अंदर धीरेेेे-धीरे हीन भावना आने लगती है।



इसके अलावा आज के समय में बच्चों पर पढ़ाई का प्रेशर भी बढा है। आज के बच्चे एनर्जी से भरपूर हैं किन्तु आखिर हैं तो बच्चे ही। उनसे उम्मीदें बहुत अधिक की जा रही हैं, जो कि किसी भी नजरिये से ठीक नहीं है। आज के समय में बच्चे खेल-कूद से दूर हो गये हैं। इन मासूमों का समय सुबह छह बजे शुरु हो जाता है। 4 से 5 घंटे में स्कूल में गुजारने के बाद फिर स्कूल का होमवर्क, फिर ट्यूशन। बच्चे हैं या फिर मशीन? उसके बाद बच्चों के प्रति पेरेंट्स और टीचर्स का रूखा व्यवहार। यही कारण है कि बच्चे नकारात्मक विचारों से घिर गये हैं। उनके साथ अच्छा व्यवहार न करना या फिर उनके साथ हमेशा डांट कर और चिल्ला कर बात करना। फलस्वरूप उनके व्यवहार में बदलाव आने लगता है और वह नकारात्मकता की ओर जाने लगते है। वह अपनी परेशानी और बात किसी से कह नहीं पाते। मानसिक रूप से भी परेशान हो जाते हैंं।

नकारात्मकता का अर्थ है स्वयं के प्रति हीन भावना का आ जाना, डरे-डरे रहना, कुछ बोल न पाना, स्वयं के प्रति सोच बदल जाना। हर चीज में कमी निकालने लगना और फिर बच्चे डचिडे स्वभाव के हो जाते हैं।

नकारात्मकता के कारण

  • बच्चों से चिल्लाकर बात करना

  • बच्चों को समय न देना

  • उन्हें हमेशा डांटना

  • बच्चों के द्वारा किये गए कामाेें में हमेशा कमी निकालना

  • बच्चों में भेदभाव करना

  • बच्चों को घर से बाहर नहीं जाने देना

  • बच्चों को दोस्तों से बात नहीं करने देना

  • बच्चों को मारना, पीटना

  • सबके सामने बच्चों की बुराई करना या उन्हें डांटना

  • उनसे कभी प्यार से बात न करना

  • दूसरे बच्चों से हमेशा तुलना करना

  • बच्चों से उनकी क्षमता से अधिक उम्मीदें करना



नकारात्मक विचारों के लक्षण

  • जब बच्चों का स्वभाव चिड़चिड़ा होने लगे

  • बच्चों को अधिक गुस्सा आने लगे

  • किसी बात का जवाब न देना

  • माता-पिता की बात न सुनना

  • अकेले रहना

  • किसी से बात न करना

  • किसी भी काम को मन लगाकर न करना

  • हर बात पर रोने लगना

  • खाना न खाना या भूख न लगना

  • छोटी-छोटी बातों पर मारपीट करना

  • स्वास्थ खराब रहना

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ये सभी लक्षण बच्चों में नकारात्मक विचारों को दर्शाते हैं, इन सब से बच्चों का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।

नकारात्मकता से बचने के उपाय

  • बच्चों से उनकी रूचि, पसंद-नापसंद आदि के बारे में बातें करें उनके साथ ज्यादा समय बिताएंं, इससे उनके स्वभाव में बहुत बदलाव आएगा और वह नकारात्मकता से बाहर निकलेंगे।

  • सप्ताह में एक बार परिवार के साथ कहीं घूमने या पिकनिक आदि पर अवश्य जायें।

  • बच्चों को हमेशा उनके काम के लिए प्रोत्साहित करें, इससे उनका कॉन्फिडेंस बढ़ेगा और उनकी नकारात्मक सोच कम होगी।

  • बच्चों को उनकी गलतियां करने पर डांटे नहीं बल्कि उन्हें प्यार से समझाए और ये भी बताएं कि किसी भी काम को कैसे किया जाए।

  • बच्चे से प्यार से बात करें, इससे उनके चिड़चिड़े स्वभाव में जरूर बदलाव आएगा और वो धीरे-धीरे नॉर्मल होने लगेगा

  • बच्चों को उनके दोस्तों के साथ खेलने के लिए भेजेंं, क्योंकि खेलने से बच्चों के दिमाग में प्रेशर कम होता है और उन्हें काफी रिलैक्स फील होता है।

  • बच्चों को पौष्टिक भोजन दें तभी उनके शरीर और दिमाग का अच्छी तरह से विकास होगा।

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  • बच्चों को किसी भी तरह की समस्या होने पर उनके साथ उस समस्या को हल करें, इससे उसका विश्वास आपके ऊपर बढ़ेगा।

  • बच्चो के काम में उनका हाथ बंटाएं और उनसे हमेशा सकारात्मक बातें करें।



यदि आपके घर में बडे बुजुर्ग अर्थात बच्चों के दादा-दादी या नाना-नानी हैं तो उन्हें अपने साथ रखने का प्रयास करें। उन्हे साथ रखने से बच्चों को अकेलापन कम महसूस होगा उनको और उआपको भी मदद मिलेगी। बच्चों को जो संस्कार किताबों से नहीं मिल पाते बच्चे वह नाना-नानी/दादा-दादी से स्वत: ही सीख जाते हैैं। घर मे बडे बुजुर्ग छायादार वृक्ष की भांंति होते हैंं उनकेे आंचल की छाया दौड-भाग भरी जिंदगी में शीतलता प्रदान करती हैं। उनके प्यार और अपनेपन को नकारें नहीं, आपके और परिवार के लिए उनका आशीर्वाद भगवान के आशीर्वाद से कम नहीं। यदि फिर भी आपको अपने बच्चे में ऐसे कोई भी लक्षण दिखते हैं, तो आप डॉक्टर से भी संपर्क करें क्योंकि आज कल अधिकतर बच्चों में नकारात्मक विचार कब उनके मन में जगह बना ले इसका पता नहीं चलता। जिसकी वजह से उनके दिमाग पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए अपने बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें।

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