google.com, pub-5665722994956203, DIRECT, f08c47fec0942fa0
 

‘एक पिता एकस के बारिक’। हमारा धर्म एक है। ‘Ek pita ekas ke baarik | Hamaara dharm ek hai

Updated: Sep 18, 2021



गुरुनानक ने सभी धर्मों को श्रेष्ठ बताया। गुरुजी ने धार्मिक एवं सामाजिक विषमताओं पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने अपनी वाणी से हिन्दू और मुसलमान दोनों के लिए एकात्मकता के बीज बोए। उनका मत ‘एक पिता एकस के बारिक’। हमारा धर्म एक है। गुरुजी स्वयं एकेश्वर में पूर्ण विश्वास रखते थे। उनका दृष्टिकोण समन्वयवादी था। गुरू नानक देव जी, रूढिवादी विचारधारा और कुसंस्कारों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने समाज में इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और लोगों के लोक कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।


 

गुरू नानक देव जी एक संत ही नहीं, अपितु एक महान आत्मा थे। उन्होंने किसी एक धर्म की बात न कर, लोक कल्याण के कार्यों पर जोर दिया। गुरुनानक देवजी का जीवन, धर्म दर्शन युगांतकारी लोकचिंतन का दर्शन था। उन्होंने सांसारिक यथार्थ से नाता नहीं तोड़ा। वे संसार को त्याग कर संन्यास लेने के खिलाफ़ थे, उनका मत था कि मनुष्य संन्यास लेकर स्वयं का अथवा समाज का लोक कल्याण नहीं कर सकता, जितना कि वह संसार में रहकर स्वाभाविक एवं सहज जीवन में कर सकता है इसलिए उन्होंने गृहस्थ में रहकर ही मानव सेवा को श्रेष्ठ धर्म बताया। गुरुनानक देवजी सिख धर्म के संस्थापक ही नहीं, अपितु मानव धर्म के उत्थापक थे। वे केवल किसी धर्म विशेष के गुरु नहीं अपितु संपूर्ण सृष्टि के जगद्गुरु थे।


https://www.merivrinda.com/post/religion?lang=hi


‘नानक शाह फ़कीर। हिन्दू का गुरु, मुसलमान का पीर।’


गुरू नानक देव जी का जन्म, पूर्व भारत की पावन धरती पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन 1469 को लाहौर से करीब 40 मील दूर स्थित तलवंडी नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम कल्याणराय मेहता तथा माता का नाम तृपताजी था। भाई गुरुदासजी लिखते हैं कि इस संसार के प्राणियों की त्रहि-त्रहि को सुनकर अकाल पूरख परमेश्वर ने इस धरती पर गुरुनानक जी को पहुँचाया।


‘सुनी पुकार दातार प्रभु, गुरु नानक जग महि पठाइया।’


उनके इस धरती पर आने पर ‘सतिगुरु नानक प्रगटिआ मिटी धूंधूं जगि चानणु होआ।’


यह सत्य है, जब नानक जी का जन्म हुआ तो जन्मस्थल अलौकिक ज्योति से भर उठा था। उनके मस्तक के पास तेज आभा फैली हुई थी। बचपन से ही गुरु नानक जी का मन आध्यात्मिक ज्ञान एवं लोक कल्याण के चिंतन में डूबा रहता। बैठे-बैठे ध्यान मग्न हो जाते और कभी तो यह अवस्था समाधि तक भी पहुँच जाती। गुरुनानक देवजी का जीवन एवं धर्म दर्शन युगांतकारी लोकचिंतन दर्शन था।

नानक देव जी का मत था कि व्यक्ति सन्यासी होकर अपना या संसार का उतना कल्याण नहीं कर सकता जितना कि वह गृहस्थ जीवन में रहकर सहजता से कर सकता है। वह सन्यासी विचारधारा से सहमत नहीं थे। यही गुरु मंत्र सिख धर्म की मुख्य आधारशिला है।


https://www.merivrinda.com/post/vaidik-aashram-vyavastha-aur-jeevan


गुरू नानक देव जी ने सिख धर्म की स्थापना की। जिस समय सिख धर्म की स्थापना हुई उस समय भारत में अधिकतर हिस्से में मुगलों का शासन था। हिन्दूओं पर अत्याचार बढ रहा था। उस समय गुरू जी ने मानव जाति को एक नई रोशनी की किरण दिखाई। मुगल शासकों द्वारा हिन्दूओं पर अत्याचार होने के बाद भी नानक देव जी ‘इक ओंकार’ के मत को ही लेकर आगे बढे।


https://www.merivrinda.com/post/rudraskha-is-the-form-of-shiva?lang=hi


नानक जी का संदेश मानव जाति के लिए था कि ‘कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं है सभी भगवान की सृष्टि में उसके द्वारा सृजित प्राणी हैं। उस समय ऐसी कई घटनाओं का वर्णन मिलता है जो रूढिवादी और कट्टरता पर सीधा चोट करती हैं।



एक बार की घटना है। मक्का में नानक देव जी आराम कर रहे थे। सोते-सोते उनके पैर कावा की ओर हो गये। एक काजी ने उन्हें देख लिया और गुस्से से बोला कि यह कौन अधर्मी खुदा की ओर पैर करके सो रहा है? गुरू जी ने तुरंत जवाब दिया कि मेरे पैर उस ओर कर दो, जिस ओर खुदा न हो। काजी ने उनके पैर कावा की ओर से हटा कर दूसरी ओर करना चाहे, किन्तु वह ऐसा कर नहीं सका क्योंकि वह जिस ओर भी गुरू जी के पैर करता, उस ओर ही उसे कावा नजर आता। वह समझ गया कि यह कोई महान आत्मा है। वह उनके पैरों में गिर गया।


गुरूजी का साफ संदेश था कि खुदा, भगवान, ईश्वर सभी सृष्टि के कण-कण में विद्यमान हैं। इसलिए भगवान को स्वयं के अंदर खोजना चाहिए और मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करने चाहिए।


https://www.merivrinda.com/post/aapake-duhkhaayen-ke-lie-kaun-jimmedaar-hai?lang=hi


गुरू जी के संदेश मौलिक भी हैं और स्पष्ट भी हैं। उन्होंने अलग-अलग मान्यताओं और मतों के संतों के विचारों का आदान-प्रदान भी किया है। उस संकीर्णता के दौर में, जब कट्टरपंथी सोच के लोग मानवजाति को संकीर्णता की ओर ले जा रहे थे, उन्होंने अतुलित उदारता का परिचय दिया। उनकी कथनी और करनी में जरा भी अंतर नहीं था। वह विद्वानों के साथ विचार-विमर्श करते, ज्ञान बढाते और उसे समाज के लोगों को देते और आसपास के संकीर्ण वातावरण को सुधारते जाते। इस प्रकार गुरू नानक देव जी ने अपना संदेश हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचाया। वह भारत और भारत के बाहर हिन्दूओं और मुस्लिमों के अनेकों तीर्थयात्राओं पर गये। विद्वानों से विचार विमर्श किया। सभी की अच्छाइयों को संजोया और लोगों को अंधकार से निकालने का कार्य किया। उनके उपदेशों में सामयिक घटनाओं की चर्चा थी।



श्वर एक है, सभी मनुष्य भाई-भाई हैं। उनके संदेशों और दृष्टिकोण में अपूर्व गहराई थी। जिनका वर्णन सिखों के धार्मिक ग्रंथ ‘गुरू ग्रंथ साहिब जी’ में मिलता है।


https://www.merivrinda.com/post/difference-between-yoga-and-meditation


वह कहते थे- अंतर आत्मा से ईश्वर का नाम जपो, ईमानदारी एवं परिश्रम से कर्म करो तथा अर्जित धन से असहाय, दुःखी पीडि़त, जरूरतमंद इंसानों की सेवा करो। इस प्रकार श्री गुरुनानक देवजी ने अन्न की शुद्धता, पवित्रता और सात्विकता पर जोर दिया।

एक बार की घटना है। गुरुजी एक बार एक गाँव में पहुँचे तो उनके लिए दो घरों से भोजन का निमंत्रण आया। एक निमंत्रण गाँव के धनाड्य मुखिया का था, दूसरा निर्धन बढ़ई का था। गुरुनानक देवजी ने बढ़ई किसान की रूखी रोटियाँ को सप्रेम स्वीकार किया। जिसे मुखिया ने अपना अपमान समझा। इस पर गुरू जी से मुखिया से उसके घर बनी रोटियां मंगवाईं और उन्हें मुखिया के सामने ही निचोड़ा, रोटियों के निचोडने पर रोटियों में रक्त टपकने लगा। दूसरी ओर किसान की रोटियों को निचोड़ा तो उसमें से निर्मल दूध की धारा फूट पड़ी। गुरुनानक देवजी ने कहा कि कु-अन्न के प्रभाव से मन मलिन, प्रदूषित तथा विकारों से युक्त हो जाता है। ऐसा भोजन कितना भी स्वादिष्ट हो, किन्तु वह खाने योग्य नहीं है। शुद्ध, सात्विक, नीति-धर्म का पालन करते हुए प्राप्त किया हो, वह आहार मानव मन को विकार रहित, निर्मल, पवित्र और सात्विक बनाता है। जैसा अन्न आप खाओगे, वैसे ही आपके आचार-विचार हो जायेंगे।


https://www.merivrinda.com/post/prem-k-ya-hai-osho?lang=hi


गुरु नानक वाणी, जन्म साखियां, फारसी साहित्य एवं अन्य ग्रंथों के अध्ययन से यह सिद्ध होता है। गुरुनानक ने सभी धर्मों को श्रेष्ठ बताया। गुरुजी ने धार्मिक एवं सामाजिक विषमताओं पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने वाणी से हिन्दू और मुसलमान दोनों के लिए एकात्मकता के बीज बोए। उनका मत ‘एक पिता एकस के बारिक’। हमारा धर्म एक है। गुरुजी स्वयं एकेश्वर में पूर्ण विश्वास रखते थे। उनका दृष्टिकोण समन्वयवादी था। गुरू नानक देव जी रूढिवादी विचारधारा और कुसंस्कारों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने समाज में इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और लोगों के लोक कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।


https://www.merivrinda.com/post/the_glory_of_shrimad_bhagwat_geeta_is_incomparable


गुरुनानक देवजी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व जितना सरल, सीधा और स्पष्ट है, उसका अध्ययन और अनुसरण भी उतना ही व्यावहारिक है। गुरुनानक उदार प्रवृत्ति वाले स्वतंत्र और मौलिक चिंतक थे। एक सामान्य व्यक्ति और एक महान आध्यात्मिक चिंतक का एक अद्भुत मिश्रण गुरु नानकदेवजी के व्यक्तित्व में अनुभव किया जा सकता है।




 
 
google.com, pub-5665722994956203, DIRECT, f08c47fec0942fa0