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अपनी पहचान स्वयं बनें | Be your own identity

Updated: Mar 27



समाज में महिलाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आधुनिक समाज में महिलाएं के दो वर्ग हैं। एक वर्किंग, दूसरी गृहिणी। दोनों की भूमिका समाज के लिए अद्वितीय है। उनके सहयोग को किसी प्रकार नकारा नहीं जा सकता। आज महिलाएं हर क्षेत्र में कार्यरत हैं। वह अंतरिक्ष, सेना, चिकित्सा क्षेत्र, वैज्ञानिक, राजनीति, शिक्षा आदि हर क्षेत्र में अपना सहयोग दे रही हैं। किन्तु इसके बिल्कुल विपरीत घरेलू महिलाएं स्वयं को दबी-कुचली, और असहाय महसूस करती हैं। उन्हें लगता है कि वह कुछ नहीं कर सकतीं। जबकि ईश्वर से अपनी सृष्टि में हर किसी को, किसी न किसी हुनर से नवाजा है। जिन्‍होंने स्‍वयं को पहचाना।

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घर वालों की नजरों में भी उनके सहयोग को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। जबकि एक रिपोर्ट के अनुसार एक गृहिणी जितना कार्य करती है वह विश्व की जानी-मानी कंपनी के सालाना कारोबार का कई गुना है। इतना ही नहीं भारतीय महिलाएं घर में बच्चों, और बुर्जुगों की देखभाल जैसे कार्य बिना सैलरी, बिना छुट्टी के सुबह 6 बजे से रात 12बजे तक लगातार करती हैं जोकि किसी देश की अर्थव्यवस्था की जीडीपी के 3-1फीसदी के बराबर है। इसलिए सभी हाउस वाइफ को यह धारणा स्वयं के अंदर से निकाल देनी चाहिए कि वह कुछ नहीं हैं। आप स्वयं अपनी पहचान बनें। समय की मांग को देखते हुए महिलाओं में आत्मविश्वास लाना होगा और प्रोत्साहित करना अत्यंत आवश्यक है। महिलाएं ही हैं जो आधुनिक समाज की तस्वीर बदल सकती हैं।



जब कभी भी महिलाओं से यह सवाल किया जाता है कि आप क्या हैं? तो अक्सर दो ही उत्तर सुनने को मिलते हैं कि ‘‘मैं सिर्फ हाउसवाइफ हूं या फिर आई एम वर्किंग’’ यानि मैं नौकरीपेशा हूं या मैं जॉब करती हूं। जब कभी कोई महिला अपना परिचय देती हैं तो दोनों में आत्मविश्वास का बहुत अंतर होता है। वर्किंग महिला बड़े ही गर्व और आत्मविश्वास से अपना परिचय देती है जबकि हाउसवाइफ थोड़ा झिझकते हुए, ‘‘नहीं मैं तो सिर्फ हाउस वाइफ हूं।’’ आत्मनिर्भर होना बहुत ही अच्छी बात है, किन्तु हाउसवाइफ होना भी किसी से कम नहीं। उन्हें यह लगता है कि यदि वह कोई नौकरी नहीं करती तो वह कुछ नहीं हैं।


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यह धारणा सही नहीं है। उनकी ही नहीं, उनके परिवार की सोच भी लगभग सही होती है कि वह घर में कुछ नहीं करतीं। उनके काम किसी गिनती में नहीं आते। एक रिपोर्ट के अनुसार घरों में रहने वाली महिलाएं जितना कार्य करती हैं वह विश्व की जानी-मानी कंपनी के सालाना कारोबार का कई गुना है। इतना ही नहीं भारतीय महिलाएं घर में बच्चों, और बुर्जुगों की देखभाल जैसे कार्य बिना सैलरी के करती हैं वह किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की जीडीपी के 3-1फीसदी के बराबर है। तो आप यह धारणा स्वयं के अंदर से निकाल फेंकिये कि आप कुछ नहीं हैं। आप अपने हुनर को पहचानें, उसके लिए समय निकालें और अपनी पहचान बनायें।

हर चीज को पैसे से तोलना सही नहीं है। अधिकतर घरों में आज भी ऐसी महिलाएं हैं जो खुशी-खुशी घर के कार्यों को करती हैं और संतुष्ट भी हैं। उन्हें घर के कार्याें को करने में खुशी मिलती है। साथ ही घर के अन्य सदस्य जैसे पति, बच्चे या घर के बड़े बुजुर्ग यदि में खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं या बच्चे या पति अपने अचीवमेंट्स को पूरा कर पा रहे हैं तो वह सिर्फ एक सगुण हाउस वाइफ के सहयोग के कारण ही। कई बार परिवार में ऐसी भी स्थिति आ जाती है कि जब घर की गृहिणी बीमार पड़ जाती हैं या फिर घर से कुछ दिनों के लिए बाहर चली जाती हैं, तो उनके बिना सारा घर अव्यस्थित हो जाता है।



कोई भी अपने कार्य समय पर नहीं कर पाता। फिर भी इस ओर किसी का भी ध्यान ही नहीं जाता कि एक फुल टाइम हाउस वाइफ की उनके जीवन में क्या भूमिका है? इसलिए सभी गृहिणी अपने मन से यह भावना पूरी तरह से निकाल दें कि वह कुछ नहीं हैं। उनमें कुछ प्रतिभा नहीं है। सबकी आवश्यकताओं का ख्याल रखना, बिना बोले सबको समझना, समय से पहले ही परिवार की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करना, आसान नहीं है। एक गृहिणी है जो बिना छुट्टी के, बिना सैलरी लिए, बिना शिकायत के सुबह 6 से रात के 12 बजे तक काम करती है। घर में सबसे पहले जागती है और सबसे बाद में सोती है। फिर भी सबकी सोच के अनुसार अक्सर घरों में यह सुनने को मिल जाता है कि दिन भर करती क्या हो? जोकि बिल्कुल भी सही नहीं है।

आज जिस हिसाब से मंहगाई बढ़ रही है। घर के खर्चे बढ़ रहे हैं उस हिसाब से आत्मनिर्भर होना बहुत ही आवश्यक है। आत्मनिर्भर होना भी आपके परिवार के लिए आपका सहयोग ही है। यह आवश्यक नहीं कि आत्मनिर्भर होने के लिए आपका घर के बाहर जाना ही आवश्यक है।


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आप घर में रहकर भी स्वयं को आत्मनिर्भर बना सकती हैं। परिवार का सहयोग कर सकती हैं। हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती ही है। आप स्वयं को पहचानिये। अपनी प्रतिभा को, हुनर को निखारें। आत्मनिर्भर होने से आत्मविश्वास बढ़ता है। आप घर, बच्चे संभालती हैं, आपके परिवार के लिए आपका सबसे बड़ा योगदान है। आपके बिना कुछ भी संभव नहीं है। सिलाई, कढाई, बुनाई, क्राफ्ट, ब्यूटीशियन, टीचिंग, कुकिंग, कंप्यूटर, लेखन आदि ऐसे बहुत से काम हैं जिनके जरिये आप स्वयं को आत्मनिर्भर बना सकती हैं। तो देर किस बात की है आप आज से और अभी से ही इस विषय पर सोचना आरंभ कर दीजिए।


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समय को सुनियोजित कीजिए। परिवार की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर समय को बांटे और स्वयं के लिए समय निकालें। आज के समय में कुछ भी असंभव नहीं है। बस कोशिश सही दिशा में होनी चाहिए। यह भी आवश्यक नहीं कि आर्थिक लाभ के लिए ही आत्मनिर्भर बना जाए, बल्कि आप सामाजिक सहयोग भी कर सकती हैं। मकसद है अपने अंदर के हुनर को पहचान कर स्वयं को पहचान देना।

दूसरा पहलू है महिलाओं का वर्किंग होना।

भारतीय समाज में वर्किंग महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में अधिक दवाब रहता है। आज के समय में महिलाओं का कार्य विविधता वाला हो गया है। घर की जिम्मेदारी में कोई कमी नहीं आई है। उन्हें ऑफिस के साथ-साथ घर की जिम्मेदारी संभालनी ही होती है। इसके बावजूद महिलाओं को कम सैलरी दी जाती है। आधुनिकता और आत्मनिर्भर होने की दौड़ में महिलाओं पर दवाब काफी बढ़ गया है।

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महिलाएं किसी भी रूप में किसी से कम नहीं हैं। वह शक्ति की प्रतीक हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें उन्होंने स्वयं को साबित न किया हो। समाज बदला है, सोच बदली है किन्तु महिलाओं के लिए नजरियों में कोई अंतर नहीं आया है।



घर की महिलाओं को स्वयं के अंदर से यह भावना निकाल देनी चाहिए कि वह अबला हैं, कमजोर हैं। ईश्वर ने उन्हें असीम शक्ति दी है। जिन्हें अगर वह महसूस करें तो हर परेशनियों का सामना बखूबी कर सकती हैं। महिलाओं को स्वयं की शक्तियों को महसूस करना चाहिए जिनसे वह अभी तक अनजान हैं। यदि इतिहास उठाकर देखा जाये तो महिलाओं की जो स्थिति है उसकी महिलाएं स्वयं ही जिम्मेदार हैं। महिलाओं के लिए महिलाएं ही परेशानी का सवब बनती हैं। चाहे वह मां, सास, ननद, पड़ोसिन, सहकर्मी कोई भी हो सकती है। यह एक कड़वा सच है। अपनी सोच बदलेंगी तभी कुछ संभव है। महिलाओं को ही महिलाओं के स्तर को उठाना होगा, हर एक उस स्त्री की मदद करनी होगी जिसकी उन्हें आवश्यकता है। इस बात को या सोच को गलत साबित करना होगा कि एक औरत ही एक औरत की दुश्मन है।

साथ ही समय के साथ पुरुष समाज को अपनी सोच बदलनी चाहिए। जब कोई भी कार्य महिलाओं के असंभव नहीं है तो पुरुषों को भी घर की जिम्मेदारियों को उठाने मेें झिझक नहीं होनी चाहिए। पति और पत्नी परिवार के दो पहिये हैं। जब दोनों में सामजस्य जितना बेहतर होगा। परिवार में खुशियां उतनी ही अधिक होंगी। परिवार की कोई भी जिम्मेदारी उठाना, दूसरे पर अहसान बिल्कुल भी नहीं है। परिवार आपका अपना है। उसके कार्य भी आपके ही हैं। एक अच्छी टीम की तरह यदि परिवार के सदस्य कार्यों को बांट कर करेंगे तो नौकरीपेशा महिलाओं पर दवाब थोड़ा कम होगा। वह जितनी खुश रहेंगी, परिवार में खुशियां उतनी ही अधिक आएंगी।




 
 
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